Impact of Increased Screen Time on Children's Sleep: What Parents Can Do | स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों की नींद पर असर: माता-पिता क्या करें

Screen time

आज के डिजिटल युग में, बच्चों का स्क्रीन टाइम (screen time) तेजी से बढ़ रहा है। मोबाइल, टैबलेट, टीवी और लैपटॉप जैसी स्क्रीन डिवाइसेज बच्चों के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की नींद को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है? हाल के शोधों के अनुसार, भारत में 5 साल से कम उम्र के 60% से अधिक बच्चे रोजाना 2 से 4 घंटे स्क्रीन पर बिता रहे हैं, जबकि 13% बच्चे वीकडेज में 8 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम ले रहे हैं। यह न केवल उनकी नींद की गुणवत्ता को खराब करता है, बल्कि उनके शारीरिक और मानसिक विकास को भी प्रभावित करता है। इस लेख में, हम स्क्रीन टाइम के नींद पर प्रभाव, इसके दुष्परिणाम और माता-पिता के लिए व्यावहारिक सुझावों पर चर्चा करेंगे।

स्क्रीन टाइम और नींद का संबंध | The Connection Between Screen Time and Sleep

स्क्रीन टाइम और बच्चों की नींद के बीच एक गहरा संबंध है। स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट (blue light) मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को दबा देती है, जो नींद को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा, स्क्रीन पर गेम खेलना या वीडियो देखना बच्चों के दिमाग को उत्तेजित करता है, जिससे उन्हें सोने में कठिनाई होती है। निम्नलिखित कारण स्क्रीन टाइम और नींद की समस्या को और स्पष्ट करते हैं:

  • ब्लू लाइट का प्रभाव: स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट मेलाटोनिन के उत्पादन को कम करती है, जिससे नींद देर से आती है या टूट-टूट कर आती है।
  • मानसिक उत्तेजना: गेम्स, कार्टून या सोशल मीडिया बच्चों के दिमाग को हाइपरएक्टिव रखते हैं, जिससे सोने से पहले शांत होना मुश्किल हो जाता है।
  • अनियमित स्लीप साइकिल: स्क्रीन टाइम की अनियमितता बच्चों की नींद की दिनचर्या को बिगाड़ देती है, जिससे वे दिनभर थके हुए और चिड़चिड़े रहते हैं।

नींद की कमी के दुष्परिणाम | Consequences of Sleep Deprivation

बच्चों में नींद की कमी कई गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकती है। नींद उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। नींद की कमी के कुछ प्रमुख दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं:

प्रभाव विवरण
थकान और सुस्ती नींद की कमी से बच्चे दिनभर थके हुए और ऊर्जाहीन महसूस करते हैं।
ध्यान में कमी अपर्याप्त नींद के कारण बच्चों का ध्यान पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में कम लगता है।
चिड़चिड़ापन नींद की कमी बच्चों को चिड़चिड़ा और जिद्दी बना सकती है, जिससे उनका व्यवहार प्रभावित होता है।
मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं लंबे समय तक नींद की कमी से बच्चों में चिंता (anxiety) और डिप्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
मोटापा स्क्रीन टाइम बढ़ने से शारीरिक गतिविधियां कम होती हैं, जिससे मोटापे का खतरा बढ़ता है।

माता-पिता क्या करें? | What Can Parents Do?

माता-पिता बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने और उनकी नींद की गुणवत्ता को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यहाँ कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं जो माता-पिता को इस समस्या से निपटने में मदद करेंगे:

  1. स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य विशेषज्ञों के अनुसार, 2-5 साल के बच्चों को दिन में 1 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं देना चाहिए। 6 साल और उससे बड़े बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को पढ़ाई, खेल और नींद के साथ संतुलित करना जरूरी है।
  2. सोने से पहले स्क्रीन-फ्री समय: सोने से कम से कम 1-2 घंटे पहले बच्चों को स्क्रीन से दूर रखें। यह ब्लू लाइट के प्रभाव को कम करता है और नींद की गुणवत्ता में सुधार करता है।
  3. निश्चित रूटीन बनाएं: बच्चों के लिए एक फिक्स्ड डेली रूटीन बनाएं, जिसमें पढ़ाई, खेल, और रेस्ट का संतुलन हो। नियमित सोने और जागने का समय नींद की साइकिल को स्थिर करता है।
  4. पैरेंटल कंट्रोल टूल्स का उपयोग: Google Family Link या अन्य ऐप्स के जरिए बच्चों के स्क्रीन टाइम को मॉनिटर और सीमित करें।
  5. रोल मॉडल बनें: माता-पिता को भी बच्चों के सामने स्क्रीन का उपयोग कम करना चाहिए। बच्चे अपने माता-पिता की आदतों की नकल करते हैं।
  6. स्क्रीन-फ्री जोन बनाएं: घर में कुछ क्षेत्र जैसे डाइनिंग टेबल और बेडरूम को स्क्रीन-फ्री जोन बनाएं।
  7. आउटडोर गतिविधियों को प्रोत्साहन: बच्चों को बाहर खेलने, साइकिल चलाने या अन्य शारीरिक गतिविधियों में शामिल करें। यह न केवल स्क्रीन टाइम कम करता है, बल्कि उनकी नींद को भी बेहतर बनाता है।
  8. शैक्षिक स्क्रीन टाइम को प्राथमिकता: सभी स्क्रीन टाइम हानिकारक नहीं होता। शैक्षिक वीडियो, इंटरैक्टिव लर्निंग ऐप्स या हेल्दी गेम्स को सीमित समय के लिए प्रोत्साहित करें।

विशेषज्ञों की राय | Expert Opinions

विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर सतर्क रहना चाहिए। नोएडा के चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. विनोद बख्शी के अनुसार, "माता-पिता अक्सर बच्चों को व्यस्त रखने के लिए स्क्रीन का सहारा लेते हैं, लेकिन इसका बच्चों के विकास पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।" इसी तरह, फेलिक्स हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ. डी.के. गुप्ता ने कहा, "5 साल से कम उम्र के 60-70% बच्चे जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम ले रहे हैं, जिसे सीमित करना जरूरी है।"

"स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना केवल बच्चों की जिम्मेदारी नहीं है; माता-पिता को भी अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा।" – डॉ. गीता श्रीनिवासन, आंखों की विशेषज्ञ[]

स्क्रीन टाइम कम करने के लिए मजेदार विकल्प | Fun Alternatives to Reduce Screen Time

स्क्रीन टाइम को कम करने के लिए बच्चों को मजेदार और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना एक प्रभावी तरीका है। यहाँ कुछ सुझाव दिए गए हैं:

  • बोर्ड गेम्स और पजल्स: बच्चों को परिवार के साथ बोर्ड गेम्स जैसे लूडो, चेस या पजल्स खेलने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • आर्ट एंड क्राफ्ट: पेंटिंग, ड्राइंग या क्राफ्ट प्रोजेक्ट्स बच्चों की रचनात्मकता को बढ़ाते हैं।
  • कहानी सुनाना: सोने से पहले बच्चों को कहानियां सुनाएं या उनके साथ किताबें पढ़ें। यह नींद को भी बेहतर बनाता है।
  • पारिवारिक समय: बच्चों के साथ समय बिताएं, जैसे कि पार्क में टहलना या साथ में खाना बनाना।

स्क्रीन टाइम के लिए आयु-आधारित दिशानिर्देश | Age-Based Screen Time Guidelines

आयु समूह अनुशंसित स्क्रीन टाइम
2 साल से कम कोई स्क्रीन टाइम नहीं (शैक्षिक वीडियो को छोड़कर)
2-5 साल 1 घंटा/दिन (शैक्षिक सामग्री के साथ)
6-10 साल 2 घंटे/दिन (खेल और पढ़ाई के साथ संतुलन)
11 साल और उससे अधिक सीमित उपयोग, माता-पिता की निगरानी के साथ

निष्कर्ष | Conclusion

बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों की नींद और समग्र स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बन रहा है। माता-पिता के रूप में, यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करें और उनकी नींद की गुणवत्ता को प्राथमिकता दें। नियमित रूटीन, स्क्रीन-फ्री जोन, और मजेदार गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को स्क्रीन की लत से दूर रखा जा सकता है। याद रखें, बच्चों का भविष्य उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है, और पर्याप्त नींद उसका आधार है। आज से ही छोटे-छोटे कदम उठाएं और अपने बच्चों को एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली की ओर ले जाएं।

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